लिवर से जुड़ी बीमारियों की बात आते ही लोगों के मन में फैटी लिवर, सिरोसिस या लिवर फेलियर जैसी समस्याएं आती हैं, लेकिन एक ऐसी गंभीर स्थिति भी है जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। यह है सार्कोपेनिया , जिसमें शरीर की मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं और उनका द्रव्यमान कम हो जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि लिवर रोगियों में यह समस्या बीमारी को और गंभीर बना सकती है।
क्या है सार्कोपेनिया?
गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. जयंत घोष के अनुसार, सार्कोपेनिया ऐसी स्थिति है जिसमें मांसपेशियों की ताकत और आकार धीरे-धीरे कम होने लगता है। इसे अक्सर बढ़ती उम्र से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन लंबे समय से लिवर की बीमारी से जूझ रहे मरीजों में इसका खतरा कहीं अधिक होता है। यह स्थिति संक्रमण, अस्पताल में भर्ती होने की संभावना, गिरने का जोखिम, सर्जरी के बाद जटिलताएं और मृत्यु के खतरे तक को बढ़ा सकती है।
लिवर की बीमारी में क्यों कमजोर होती हैं मांसपेशियां?
विशेषज्ञों के मुताबिक, लिवर शरीर में प्रोटीन बनाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब लिवर लंबे समय तक ठीक से काम नहीं करता, तो शरीर में पर्याप्त प्रोटीन नहीं बन पाता, जिससे मांसपेशियों पर सीधा असर पड़ता है। इसके अलावा भूख कम लगना, कुपोषण, हार्मोनल बदलाव, शरीर में सूजन और लगातार रहने वाली इंफ्लेमेशन भी मांसपेशियों के तेजी से कमजोर होने का कारण बनती है। सार्कोपेनिया का जोखिम विशेष रूप से उन लोगों में अधिक होता है जिन्हें फैटी लिवर, लिवर सिरोसिस, हेपेटाइटिस, अन्य पुरानी लिवर संबंधी बीमारियां हैं। ऐसे मरीजों के लिए केवल लिवर की जांच ही नहीं, बल्कि मांसपेशियों की ताकत और स्थिति का नियमित मूल्यांकन भी जरूरी माना जाता है।
इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें
सार्कोपेनिया की शुरुआत सामान्य कमजोरी जैसी लग सकती है, लेकिन यदि ये लक्षण लगातार बने रहें तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है-
- लगातार कमजोरी और थकान
- सीढ़ियां चढ़ने में कठिनाई
- हाथों की पकड़ कमजोर होना
- बार-बार संतुलन बिगड़ना या गिर जाना
- चलने की गति धीमी होना
- रोजमर्रा के काम करने में परेशानी
- सही पोषण और व्यायाम है बचाव की कुंजी
विशेषज्ञों का कहना है कि लिवर रोगियों के लिए दवाइयों के साथ संतुलित आहार और नियमित शारीरिक गतिविधि भी बेहद जरूरी है। पर्याप्त प्रोटीन, डॉक्टर की सलाह के अनुसार स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और संतुलित भोजन मांसपेशियों को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं। हालांकि, बिना डॉक्टर की सलाह के प्रोटीन कम करना या कोई नया व्यायाम शुरू करना उचित नहीं है, क्योंकि हर मरीज की जरूरत अलग होती है।
कैसे होती है पहचान?
सार्कोपेनिया की पहचान केवल वजन देखकर नहीं की जा सकती। इसके लिए डॉक्टर मांसपेशियों की ताकत, चलने की क्षमता, पोषण की स्थिति और आवश्यकता पड़ने पर CT स्कैन या MRI जैसी जांचों की मदद लेते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, सिरोसिस जैसे गंभीर लिवर रोगियों में शरीर में पानी जमा होने के कारण वजन सामान्य या अधिक दिखाई दे सकता है, जबकि मांसपेशियां लगातार कम हो रही होती हैं।
लिवर रोगियों को क्या करना चाहिए?
यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय से लिवर की बीमारी है, तो उसे संतुलित और पौष्टिक आहार लेना चाहिए। डॉक्टर की सलाह के अनुसार पर्याप्त प्रोटीन का सेवन करना चाहिए। शराब से पूरी तरह दूरी बनानी चाहिए।
नियमित जांच और फॉलो-अप कराना चाहिए। चिकित्सकीय सलाह के अनुसार शारीरिक गतिविधियां जारी रखनी चाहिए। लगातार कमजोरी या मांसपेशियों की ताकत कम होने को सामान्य उम्र का असर मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
निष्कर्ष
सार्कोपेनिया लिवर रोगियों के लिए एक ‘साइलेंट रिस्क’ है, जिसकी समय पर पहचान और सही उपचार से गंभीर जटिलताओं के खतरे को कम किया जा सकता है। यदि लिवर की बीमारी के साथ लगातार कमजोरी, मांसपेशियों में कमी या दैनिक कार्य करने में कठिनाई महसूस हो रही है, तो विशेषज्ञ से परामर्श लेना जरूरी है।
